सरल भाषा में, दिल को छू लेने वाली:
“आख़िरी चिट्ठी” — एक नई लघु कहानी
एक पहाड़ी गाँव में एक बूढ़ा डाकिया रहता था — नाम था रामू काका। उम्र हो गई थी, हाथ काँपते थे, पर रोज़ सुबह उठकर वह बैग कंधे पर डाल ही लेते। लोग कहते,
“काका, अब आराम कर जाइए।”
वह मुस्कुरा कर जवाब देते, “अभी मेरा काम पूरा नहीं हुआ।”
एक दिन उन्हें अपने बैग में एक पुरानी, पीली-सी लिफ़ाफ़ा मिली। तारीख़ देखी—बीस साल पुरानी! शायद किसी थैले में दबकर रह गई थी। लिफ़ाफ़े पर लिखा था — “तारा के नाम”।
रामू काका तुरंत उस घर की ओर चल पड़े जहाँ तारा रहती थी। पहुँचकर उन्होंने दरवाज़ा खटखटाया। दरवाज़ा एक अधेड़ उम्र की महिला ने खोला।
“हाँ, मैं तारा ही हूँ,” उसने कहा।
रामू काका ने झिझकते हुए उसे चिट्ठी दी और बोले,
“यह… बहुत साल पहले की है। शायद कहीं गुम हो गई थी।”
तारा ने चिट्ठी खोली। जैसे ही उसने पढ़ना शुरू किया, उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
यह चिट्ठी उसके बचपन के दोस्त अर्जुन की थी—जो शहर जाते समय भेजी गई आख़िरी चिट्ठी थी। उसी सफ़र में एक दुर्घटना में उसकी मौत हो गई थी। तारा को कभी पता ही नहीं चला कि वह उसे लिखकर गया था।
चिट्ठी में लिखा था—
“अगर कभी लौट कर न आ सका, तो बस यही जान लेना कि मेरी सबसे प्यारी दोस्त तुम ही थी।”
तारा ने काँपते हाथों से चिट्ठी सीने से लगा ली।
रामू काका अपराधी-सा नज़र झुकाए खड़े थे।
तारा ने आँसू पोंछकर मुस्कुराते हुए कहा,
“काका… आपने देर से सही, पर यह मेरी ज़िंदगी की सबसे कीमती चीज़ मुझे लौटा दी।”
उस दिन रामू काका पहली बार सोच पाए—
शायद, उनका काम अब पूरा हो गया था।


