बहुत समय पहले की बात है। हिमालय की गोद में बसे प्राचीन भारत में ऋषि-मुनियों का समय था। उन दिनों ज्ञान की खोज जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य माना जाता था। उन्हीं दिनों एक अत्यंत तेजस्वी बालक ने जन्म लिया — वेद व्यास।
🌕 जन्म और बाल्यकाल
वेद व्यास का जन्म आषाढ़ महीने की पूर्णिमा को हुआ था। उनकी माता थीं सत्यवती, और पिता महान ऋषि पराशर। जन्म से ही व्यास असाधारण थे। वे बचपन से ही वेद, उपनिषद, पुराण और दर्शन के प्रति अद्भुत जिज्ञासा रखते थे। कुछ ही समय में उन्होंने इतना ज्ञान अर्जित कर लिया कि देवता भी उनका सम्मान करने लगे।
📖 वेदों का विभाजन
उस समय तक सारे वेद — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद — एक ही विशाल ग्रंथ के रूप में थे। उन्हें समझना और याद रखना बहुत कठिन हो गया था। तब व्यास ने अपनी गहरी बुद्धि से चारों वेदों को अलग-अलग भागों में विभाजित किया ताकि हर कोई उन्हें सीख और समझ सके।
इस कारण उन्हें “वेद व्यास” कहा गया — अर्थात “वेदों का विभाजन करने वाला”।
🕉️ गुरु और शिष्य की परंपरा
व्यास ने अनेक शिष्यों को ज्ञान दिया। उन्होंने केवल ग्रंथ नहीं रचे, बल्कि ज्ञान को जीवन का आधार बना दिया। उनके शिष्य पवित्र ग्रंथों का अध्ययन करते और समाज में धर्म, सत्य और न्याय का प्रचार करते। इस प्रकार, व्यास केवल एक ऋषि नहीं, बल्कि “आदिगुरु” बन गए — वह गुरु जिनसे ज्ञान की परंपरा प्रारंभ हुई।
🌕 गुरु पूर्णिमा का जन्म
जिस दिन वेद व्यास का जन्म हुआ, वह दिन था आषाढ़ मास की पूर्णिमा। उनके जन्मदिवस को उनके महान योगदान की स्मृति में गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाने लगा।
उस दिन शिष्य अपने गुरु को प्रणाम करते, उनका आशीर्वाद लेते, और ज्ञान के प्रति अपनी निष्ठा को नवीनीकृत करते।
🙏 कहानी का सार
एक बार, जब व्यास अपने शिष्यों को शिक्षा दे रहे थे, तब उन्होंने कहा—
“गुरु वह दीपक है जो अंधकार में भी राह दिखाता है।
शिष्य वह है जो उस प्रकाश को अपने जीवन में उतारता है।”
तब से हर वर्ष यह दिन उस संबंध को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है जो गुरु और शिष्य के बीच सबसे पवित्र होता है — ज्ञान का संबंध।
🌸 संदेश
गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि स्मरण है उस व्यक्ति का, जिसने हमें अज्ञान से ज्ञान की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने में मार्गदर्शन किया।
“गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय,
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय।”
गुरु पूर्णिमा की जादुई कहानी
🌄 अध्याय 1: हिमालय की गोद में जन्म
बहुत बहुत समय पहले, हिमालय की शांत घाटियों में एक प्यारा बच्चा पैदा हुआ।
उसका नाम था वेद व्यास।
बर्फ से ढकी पहाड़ियों के बीच, छोटी-सी कुटिया में माँ सत्यवती अपने बेटे को प्यार से सुलाती थीं।
व्यास जी के पिता थे महान ऋषि पराशर।
माँ कहतीं —
“बेटा, हमेशा सच्चाई और ज्ञान का मार्ग चुनना।”
व्यास मुस्कुराते हुए कहते —
“माँ, मैं सब कुछ जानना चाहता हूँ — यह दुनिया, पेड़, नदियाँ, और सितारे भी!” 🌟
📖 अध्याय 2: ज्ञान की खोज
व्यास बड़े हुए और जंगलों में ऋषियों से विद्या सीखने लगे।
वे घंटों नदी किनारे बैठकर सोचते —
“इतने सारे वेद हैं… लोग इन्हें समझ नहीं पा रहे। कुछ तो करना होगा!”
फिर उन्होंने सोचा —
“अगर मैं इन्हें भागों में बाँट दूँ, तो सब लोग आसानी से पढ़ पाएँगे।”
उन्होंने सारे वेदों को चार भागों में बाँट दिया —
1️⃣ ऋग्वेद
2️⃣ यजुर्वेद
3️⃣ सामवेद
4️⃣ अथर्ववेद
देवताओं ने प्रसन्न होकर कहा —
“व्यास, तुम सच में महान हो! तुमने ज्ञान को सबके लिए आसान बना दिया।”
🕉️ अध्याय 3: गुरु और शिष्य
व्यास जी ने कई शिष्यों को शिक्षा दी।
सुबह वे नदी किनारे बैठकर कहते —
“बच्चो, ज्ञान सबसे बड़ा खज़ाना है। इसे जितना बाँटो, उतना बढ़ता है।”
शिष्य folded hands करके बोलते —
“गुरुदेव, हमें सिखाइए कि जीवन में अच्छा इंसान कैसे बनें।”
व्यास जी मुस्कुराते और कहते —
“जो दूसरों की भलाई करे, वही सच्चा ज्ञानी है।” 🌼
🌕 अध्याय 4: गुरु पूर्णिमा का जन्म
जिस दिन वेद व्यास जी का जन्म हुआ था, वह दिन था आषाढ़ महीने की पूर्णिमा।
उस दिन चाँद बहुत सुंदर था, और पूरा आसमान जैसे चमक रहा था। 🌕
तभी देवताओं ने कहा —
“आज से यह दिन ‘गुरु पूर्णिमा’ कहलाएगा, क्योंकि आज आदिगुरु का जन्म हुआ है।”
तब से हर साल इस दिन शिष्य अपने गुरु को धन्यवाद देते हैं, उनके चरण स्पर्श करते हैं और कहते हैं —
“गुरुदेव, आपने हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाया। धन्यवाद!” 🙏
🌸 अध्याय 5: कहानी का संदेश
बच्चो, गुरु केवल स्कूल के टीचर नहीं होते —
हमारे माता-पिता, दादा-दादी, और जो हमें कुछ अच्छा सिखाएँ — सब हमारे गुरु हैं।
“गुरु वह दीपक है जो अंधकार मिटाता है,
और जीवन को रोशनी से भर देता है।” 💫
📚 अंत में
उस दिन से हर साल जब पूरा चाँद आसमान में निकलता है,
लोग दीप जलाते हैं, अपने गुरुओं को प्रणाम करते हैं और कहते हैं —
“गुरु पूर्णिमा की शुभकामनाएँ!” 🌕✨


