यह रही “चतुर सियार” की नाटकीय प्रस्तुति (नाटक) — जिसे मंच पर अभिनय के रूप में पेश किया जा सकता है। इसमें पात्रों के संवाद, दृश्य, मंच निर्देशन और नैतिक संदेश शामिल हैं।
🎭 नाटक: चतुर सियार
अधारित: लोककथा पर
श्रेणी: बाल/शिक्षाप्रद नाटक
अवधि: लगभग 20–25 मिनट
पात्र:
- सियार (मुख्य पात्र, चालाक और नाटकीय)
- शेर (राजा, शक्तिशाली लेकिन भोला)
- हाथी (बुद्धिमान लेकिन शांत)
- बंदर (हास्य और चंचलता का पात्र)
- हिरण (डरा हुआ और मासूम)
- नर्तक/गायक जानवर (पार्श्व जानवर)
- धोबी के कुत्ते (बिना संवाद, दौड़ते हैं)
- सूत्रधार (Narrator/कथावाचक)
दृश्य 1: जंगल में सूखा
(मंच पर जंगल का दृश्य। जानवर इधर-उधर घूम रहे हैं, उदास हैं।)
सूत्रधार:
(पार्श्व से)
बहुत समय पहले की बात है। एक घने जंगल में जानवर सुख-शांति से रहते थे। लेकिन एक दिन सूखा पड़ गया। खाने-पीने की कमी हो गई। सभी जानवर परेशान हो उठे। एक सियार, जो थोड़ा चतुर था, भोजन की तलाश में गाँव की ओर चल पड़ा…
(सियार थका हुआ आता है, भूखा है)
सियार:
(थका हुआ)
ऊंह… जंगल में तो कुछ भी खाने को नहीं मिल रहा। क्यों न गाँव चलकर देखा जाए! वहाँ शायद कुछ बचा-खुचा मिल जाए।
(सियार गाँव की ओर जाता है। मंच का एक हिस्सा धोबी के घर और तालाब की तरह सजाया गया है। कुत्ते दौड़ते हैं।)
सियार:
अरे! ये कुत्ते!! (डरता है)
भागो… भागो…!
(सियार डरकर इधर-उधर भागता है और गलती से रंग के टब में गिर जाता है। उठता है, पूरा नीला हो चुका है।)
सियार:
(खुश होकर)
वाह! मैं तो बिल्कुल अलग दिख रहा हूँ। कोई मुझे पहचान ही नहीं पाएगा! अब मज़ा आएगा। चलो जंगल वापस चलते हैं।
दृश्य 2: जंगल में नया प्राणी
(जंगल का दृश्य, सभी जानवर इकट्ठे हैं। सियार रंगे हुए प्रवेश करता है। सभी चौंकते हैं।)
हिरण:
ये… ये क्या है? मैंने ऐसा जानवर कभी नहीं देखा!
बंदर:
शायद ये आसमान से गिरा है! एलियन हो सकता है!
शेर:
(गंभीरता से)
तुम कौन हो? और हमारे जंगल में क्यों आए हो?
सियार:
(रौब से)
मैं स्वर्ग से आया हूँ। भगवान ने मुझे इस जंगल का राजा बनाने के लिए भेजा है। अब मैं ही तुम्हारा मार्गदर्शन करूंगा।
हाथी:
(चौंककर)
स्वर्ग से? तो आप हमारे नए राजा हैं?
सियार:
हाँ, और अब से तुम सब मेरी सेवा करोगे।
(सभी जानवर झुक जाते हैं। सियार मुस्कुराता है। हल्का नाटकिय संगीत)
दृश्य 3: नया राजा, नया शासन
(सियार सिंहासन पर बैठा है। जानवर सेवा कर रहे हैं। कोई पंखा झल रहा है, कोई फल ला रहा है।)
बंदर:
महाराज, आम लाया हूँ।
हिरण:
मेरे हिस्से की घास भी आपको अर्पित करता हूँ।
सियार:
(गर्व से)
बहुत अच्छे प्रजाजनों! मुझे प्रसन्नता हो रही है।
(पार्श्व में संवाद)
सूत्रधार:
अब सियार राजा बन चुका था। बाकी सियारों को उसने जंगल से भगा दिया, ताकि कोई उसकी असलियत न जान सके। लेकिन घमंड धीरे-धीरे उस पर हावी होने लगा…
दृश्य 4: सियार की गलती
(रात्रि का दृश्य, चाँदनी रात। संगीत धीमा। दूर से सियारों की हूक सुनाई देती है — “हुआ… हुआ…” )
सियार:
(हूक की आवाज़ सुनकर खुद को रोकता है)
नहीं! नहीं! मैं राजा हूँ, मुझे नहीं बोलना चाहिए…
(थोड़ी देर बाद फिर आवाज आती है। सियार खुद को रोक नहीं पाता)
सियार:
(हूकता है ज़ोर से)
हुआ… हुआ… हुआ…!
(सभी जानवर चौंककर आते हैं।)
शेर:
अरे! यह तो सियार की आवाज़ है!
हाथी:
यह कोई देवदूत नहीं, एक धोखेबाज़ सियार है!
बंदर:
हमें मूर्ख बना दिया इसने!
(सभी जानवर मिलकर सियार को पकड़ते हैं)
दृश्य 5: असलियत का पर्दाफाश और सजा
शेर:
धोखा देने वालों को जंगल में जगह नहीं मिलती।
हाथी:
तूने हमें ठगा है। अब इसकी सजा भुगत।
सियार:
(गिरगिराता है)
मुझे माफ कर दो। मैंने भूख के कारण ऐसा किया। मुझसे भूल हो गई।
शेर:
हम तुझे माफ करते हैं, पर जंगल से निकाल देते हैं।
जा, और दोबारा कभी लौटकर मत आना।
(सियार सिर झुकाकर मंच से बाहर चला जाता है)
दृश्य 6: अंतिम दृश्य – संदेश
(सभी जानवर एक साथ आते हैं। मंच पर एकता दिखाई जाती है)
सूत्रधार:
तो बच्चों, इस नाटक से हमें क्या सीख मिलती है?
बंदर:
चालाकी अच्छी बात है, पर उसे गलत कामों में नहीं लगाना चाहिए।
हिरण:
झूठ की उम्र थोड़ी होती है।
हाथी:
और राजा वही होना चाहिए जो सच्चा और निस्वार्थ हो।
शेर:
हमेशा सच्चाई और एकता में ही शक्ति होती है।
🎓 नैतिक शिक्षा:
“झूठ और चालाकी से मिले सिंहासन की उम्र बहुत कम होती है। सच्चाई ही सच्चा राज है।”



