भारतीय संस्कृति में धर्म और कर्म दो ऐसे स्तंभ हैं, जिन पर संपूर्ण जीवन दर्शन आधारित है। हमारे ग्रंथों, उपनिषदों, महाकाव्यों तथा लोकाचार में इन दोनों की महत्ता को अत्यधिक महत्व दिया गया है। धर्म और कर्म एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, लेकिन दोनों की व्याख्या अपने-अपने स्तर पर की जाती है। जब कोई व्यक्ति अपने जीवन में धर्म और कर्म का संतुलन बनाए रखता है, तभी वह सच्चे अर्थों में मानवता के मार्ग पर अग्रसर हो सकता है।
धर्म की परिभाषा और स्वरूप:
धर्म शब्द संस्कृत के “धृ” धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है – “धारण करना”। धर्म का शाब्दिक अर्थ है – वह जो धारण करने योग्य हो, जो जीवन को मर्यादित, संयमित, और सद्गुणों से युक्त बनाए।
भारतीय दर्शन में धर्म का तात्पर्य केवल पूजा-पाठ, कर्मकांड या धार्मिक क्रियाओं से नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक जीवन प्रणाली है। यह मनुष्य के आचरण, विचार, व्यवहार, कर्तव्यों और जीवन मूल्यों से जुड़ा हुआ है। मनु स्मृति में कहा गया है:
“धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥”
अर्थात धैर्य, क्षमा, आत्मसंयम, चोरी न करना, पवित्रता, इन्द्रियों का निग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना – ये दस धर्म के लक्षण हैं।
कर्म की परिभाषा और प्रकार:
कर्म का अर्थ है – कार्य, क्रिया या गतिविधि। यह एक ऐसा सार्वभौमिक सिद्धांत है जो प्रत्येक व्यक्ति के जीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। भगवद् गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया है। गीता के तीसरे अध्याय में कहा गया है:
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥”
अर्थात तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, फल में नहीं। इसलिए तू कर्मफल का कारण मत बन और न ही अकर्मण्यता (कर्म न करने) में आसक्त हो।
कर्म को तीन श्रेणियों में बाँटा गया है –
- सत्यकर्म – जो धर्म के अनुकूल हो।
- असत्यकर्म – जो अधर्म से प्रेरित हो।
- निष्काम कर्म – जो फल की इच्छा से रहित हो, केवल कर्तव्य भावना से किया गया हो।
धर्म और कर्म का पारस्परिक संबंध:
धर्म और कर्म एक-दूसरे के पूरक हैं। बिना धर्म के किया गया कर्म सिर्फ एक सांसारिक क्रिया है, जिसका कोई आध्यात्मिक मूल्य नहीं होता, वहीं धर्म के नाम पर किया गया कर्म अगर सत्य, न्याय और मानवता से विमुख है तो वह अधर्म बन जाता है। अतः यह आवश्यक है कि कर्म धर्म के मार्ग पर चले, और धर्म कर्म के माध्यम से जीवन में उतरे।
उदाहरण के लिए, यदि एक चिकित्सक धर्म के अनुसार अपने कर्म का पालन करता है तो वह मरीज का निस्वार्थ भाव से इलाज करता है, न कि केवल पैसे कमाने के उद्देश्य से। इसी प्रकार, एक शिक्षक का धर्म है कि वह अपने विद्यार्थियों को सच्चाई, कर्तव्य और अनुशासन का पाठ पढ़ाए। जब यह धर्म कर्म के रूप में प्रकट होता है, तभी वह समाज के लिए उपयोगी सिद्ध होता है।
महाभारत में धर्म और कर्म:
महाभारत का सम्पूर्ण कथानक धर्म और कर्म के टकराव की कहानी है। युधिष्ठिर को धर्मराज कहा गया क्योंकि उन्होंने अपने जीवन में सदैव धर्म को प्राथमिकता दी। वहीं अर्जुन को श्रीकृष्ण ने कर्म का उपदेश दिया और कहा कि युद्ध करना उसका कर्तव्य (स्वधर्म) है।
“स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥”
अर्थात स्वधर्म में मर जाना भी श्रेयस्कर है, परधर्म में आचरण करना भयावह है।
इससे स्पष्ट होता है कि धर्म और कर्म का समन्वय जीवन को सार्थक बनाता है।
आधुनिक समाज में धर्म और कर्म की भूमिका:
आज के भौतिकतावादी युग में धर्म और कर्म की व्याख्या को नए सन्दर्भों में देखा जा रहा है। लोग धर्म को जाति, पंथ, और सम्प्रदाय तक सीमित कर चुके हैं, वहीं कर्म को केवल सफलता पाने का माध्यम मानते हैं। लेकिन यह अधूरी समझ है।
आज के समय में धर्म का वास्तविक अर्थ है – नैतिकता, सत्य, करुणा, सेवा और कर्तव्यनिष्ठा। और कर्म का सही रूप है – समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करना।
जब एक राजनेता जनकल्याण के लिए कार्य करता है, एक पुलिसकर्मी ईमानदारी से सेवा करता है, एक व्यापारी नापतौल में ईमानदारी बरतता है – तब वह अपने कर्म के साथ धर्म का भी पालन कर रहा होता है।
धर्म व कर्म के आदर्श उदाहरण:
- महात्मा गांधी – सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर उन्होंने धर्म का पालन किया, और स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाकर कर्म को भी निभाया।
- स्वामी विवेकानंद – उन्होंने युवाओं को कर्मयोग का उपदेश दिया, और जीवनभर धर्म के मर्म को समाज में फैलाते रहे।
- डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम – एक वैज्ञानिक और राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने अपने कर्म को धर्म की भावना से जोड़ा।
धर्म और कर्म का संतुलन:
धर्म और कर्म का संतुलन व्यक्ति को न केवल समाज में एक आदर्श नागरिक बनाता है, बल्कि आत्मिक शांति भी प्रदान करता है। जब व्यक्ति धर्म को आधार बनाकर कर्म करता है, तो वह न तो अहंकार में डूबता है, न ही फल की चिंता करता है। ऐसे कर्म को ‘निष्काम कर्म’ कहा जाता है।
गीता में कहा गया है कि जो व्यक्ति धर्मयुक्त कर्म करता है, वही मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।
“योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।”
धर्म और कर्म का शिक्षा से संबंध:
शिक्षा केवल ज्ञान का संचय नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की कला सिखाती है। जब शिक्षा धर्म आधारित हो और उसका उद्देश्य कर्मठता हो, तभी समाज में योग्य नागरिक बनते हैं। यदि विद्यार्थी अपने अध्ययन को धर्म समझकर मेहनत करता है, तो न केवल उसका भविष्य उज्ज्वल होता है, बल्कि वह देश का गौरव भी बढ़ाता है।
धर्म और कर्म जीवन की दो धुरी हैं। इन दोनों के बिना जीवन अधूरा है। धर्म मनुष्य को नैतिकता, संयम और कर्तव्य का बोध कराता है, तो कर्म उसे क्रियाशील, प्रेरित और सक्रिय बनाए रखता है। यदि कोई व्यक्ति धर्म को समझे बिना कर्म करता है, तो वह भ्रमित हो सकता है, और यदि कोई कर्म से विमुख होकर केवल धर्म की बात करता है, तो वह भी जीवन के उद्देश्य से भटक सकता है।
इसलिए, धर्म को कर्म का मार्गदर्शक बनाकर जीवन में आगे बढ़ना ही सच्ची सफलता है। यही हमारे ग्रंथों, संतों और महापुरुषों का संदेश है।
~ धर्म और कर्म का समन्वय ही जीवन का सच्चा पथ है। ~



