पुरुष के पास पैसा हो तो औरत वस्त्रहीन हो जाती है, और अगर पैसे ना हों, तो आदमी वस्त्रहीन हो जाता है।

Story King

राहुल एक छोटे से शहर का लड़का था। साधारण परिवार, सीमित साधन, लेकिन बड़े सपने। उसके पिता एक रिटायर्ड स्कूल मास्टर थे, जिन्होंने अपनी ईमानदारी को कभी बिकने नहीं दिया। माँ पूजा-पाठ में लगी रहने वाली, और बहन… अभी कॉलेज में।

राहुल पढ़ाई में तेज़ था, मेहनती भी। दिल्ली आकर उसने एक छोटी IT कंपनी में नौकरी शुरू की। सैलरी ज्यादा नहीं थी, पर घर में पहली बार एसी लगा था। पहली बार बहन के लिए नए कपड़े खरीदे थे। पहली बार मां-बाबा को ट्रेन से एयरपोर्ट ले गया था।

और फिर कीर्ति आई।

कीर्ति एक मिडिल-क्लास लेकिन आधुनिक सोच वाली लड़की थी। वही ऑफिस, वही प्रोजेक्ट। बातचीत कॉफी से शुरू हुई और फोन कॉल्स तक जा पहुंची। फिर वक़्त मिला तो एक-दूसरे की आंखों में उतर गए।

राहुल को लगा — “यही है, मेरी जीवन संगिनी।”

कीर्ति भी राहुल की ईमानदारी, सीधापन और परिवार के प्रति समर्पण से प्रभावित हुई। कुछ ही महीनों में राहुल ने कीर्ति से शादी की बात कर दी। घरवालों से मिलवाया। बाबा ने तो तुरंत ही हामी भर दी —
“लड़की भली है, और लड़का तो अपना सच्चा है। भगवान साथ देंगे।”

लेकिन… कीर्ति के घर में बात इतनी सीधी नहीं थी।

उनके पिता रिटायर्ड बैंक मैनेजर थे। मां गृहिणी, पर समाज में अपनी इज़्ज़त का बहुत ख़्याल। उन्होंने राहुल का सीवी जैसे स्कैन किया —
“कितनी सैलरी है?”
“खुद का घर है?”
“कार कौन-सी है?”
“विदेश गए हो कभी?”

और फिर एक शब्द आया — “Mismatch.”

राहुल ने कीर्ति से कहा, “देखो, आज भले इतना नहीं है, लेकिन कल होगा। तुम्हारे साथ होऊंगा, ये वादा है।”

कीर्ति चुप रही।
फिर बोली, “मम्मी-पापा को मनाना बहुत मुश्किल है।”

अगले कुछ हफ्तों में कॉल्स कम होने लगीं। फिर एक दिन एक मैसेज आया —
“मुझे नहीं लगता ये रिश्ता चल पाएगा। प्लीज़ मुझे भूल जाओ।”

राहुल की दुनिया जैसे थम गई

भाग 2: गिरना और उठना

राहुल ने खाना छोड़ दिया, नींद उड़ गई। ऑफिस में भी चुपचाप बैठा रहता। एक दोस्त ने ताना मार दिया —
“भाई, तूने प्यार किया है, निवेश नहीं। पैसा होता तो लड़की भी होती। पुरुष के पास पैसा हो तो औरत वस्त्रहीन हो जाती है, और अगर पैसे ना हों, तो आदमी वस्त्रहीन हो जाता है।”

राहुल मुस्कुरा दिया, लेकिन आंखें गीली थीं।

पर एक दिन उसने आईने में खुद को देखा और कहा —
“तू टूटा है, खत्म नहीं।”

उसने काम पर ध्यान लगाया, नई स्किल्स सीखी, दूसरी नौकरी पकड़ी। सैलरी तीन गुनी हो गई। कुछ सालों में खुद की स्टार्टअप शुरू की।
और धीरे-धीरे वो राहुल, जिसे लोग “सीधा-सादा” कहते थे — अब एक नाम बन गया।

सात साल बाद, एक कॉर्पोरेट कॉन्फ्रेंस में राहुल एक स्पीकर बनकर पहुंचा। हाथ में वही घड़ी — जो पिता की थी। पर अब सूट हजारों का था और पास बैठी टीम करोड़ों की।

वह स्टेज से उतरा ही था कि सामने से कीर्ति आती दिखी — अब उम्र की थकान आंखों में झलकती थी।
वो एक बड़ी कंपनी की असिस्टेंट मैनेजर थी, और राहुल की कंपनी उसका क्लाइंट।

नज़रों का सामना हुआ।

कीर्ति ने धीमे से कहा,
“तुम्हें देखकर अच्छा लगा… बहुत आगे निकल गए हो।”

राहुल ने मुस्कुरा कर जवाब दिया,
“तुम्हारा शुक्रिया… कभी तुमने ना छोड़ा होता, तो शायद मैं खुद को इतना नहीं खोज पाता।”

कीर्ति की आंखों में अफसोस था। पर राहुल की आंखों में शांति थी।

वो मुड़ा, अपनी टीम के साथ बाहर निकल गया।
पीछे एक पुरानी कहानी रह गई —
जिसमें प्यार था, पर समझ नहीं।
जिसमें सपने थे, पर समर्थन नहीं।
जिसमें विश्वास टूट गया… सिर्फ पैसे के तराज़ू में।

कुछ रिश्ते वस्त्रों से नहीं, विश्वास से बनते हैं।
और कुछ टूट जाते हैं… जब इज्ज़त की जगह कीमत लगाई जाती है।

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