मनुष्य का जीवन पाप और पुण्य के बीच संतुलन का एक धागा है

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मनुष्य का जीवन पाप और पुण्य के बीच संतुलन का एक धागा है। जो इस धागे को सतगुरु के निर्देशों से बांध लेता है, उसका जीवन—even एक चोर का—राजसी बन सकता है। यह कहानी एक ऐसे चोर की है, जो सतगुरु की कृपा और एक मात्र वचन को निभाने के कारण न केवल अपराध से मुक्ति पाता है, बल्कि एक सम्पूर्ण राज्य का राजा बन जाता है।

एक दूरस्थ गांव में एक चोर रहता था। नाम भले ही उसका कोई खास न था, लेकिन उसके कारनामे दूर-दूर तक मशहूर थे। उसने कभी किसी की भावनाओं की कद्र नहीं की, उसे सिर्फ धन और अपने मतलब से ही लगाव था। परंतु एक दिन, किसी सत्संग के दौरान उसकी मुलाकात एक सिद्ध सतगुरु से हुई।

चोर ने सतगुरु से कहा,
“गुरुदेव! मैं जीवन भर गलत करता आया हूँ, पर अब चैन नहीं मिलता। कोई राह दिखाईये।”

सतगुरु ने उसकी आंखों में झाँका और कहा:
“तू यदि सच में बदलना चाहता है, तो मेरी एक बात जीवन भर मान।”
“जो आज से पराई स्त्री है, उसे माता मान, उसकी ओर कभी गलत दृष्टि से न देख।”

चोर को ये बात साधारण लगी, पर वह वचन दे बैठा।
गुरु बोले: “यही बात तेरे जीवन की दिशा बदलेगी।”

राजमहल की ओर बढ़ते कदम

कुछ महीनों बाद, वही चोर एक शहर में पहुँचा, जहाँ एक शक्तिशाली परंतु निःसंतान राजा शासन करता था। राजा ने अपनी प्रिय रानी को राजधानी से दूर एक विश्राम गृह में रखा था। वहां कोई भी पुरुष जाने की अनुमति नहीं थी।

एक रात चोर चोरी के इरादे से उसी विश्राम गृह में घुस गया। रानी के सेवकों ने शोर मचा दिया और रानी स्वयं बाहर आईं। उन्होंने चोर को देखा और पूछा,
“क्यों आए हो? चोरी करने?”

चोर ने सिर झुका लिया।
“हाँ, पर अब नहीं कर सकता।”

रानी: “क्यों?”
चोर: “क्योंकि मेरे गुरु ने कहा है — पराई स्त्री को माता समझ। आप मेरी माता के समान हैं।”

रानी हतप्रभ रह गईं। उन्होंने अपने गहने उतार कर चोर को देने चाहे।
पर चोर ने मना कर दिया।
“माँ की संपत्ति चुराना अधर्म है।”

रानी ने अंदर जाकर राजमहल में समाचार भिजवाया। राजा स्वयं छुपकर आया और सारा दृश्य देखा। उसे विश्वास नहीं हुआ कि कोई चोर ऐसा भी व्यवहार कर सकता है।

राजा की परीक्षा और वचन

राजा ने चोर को बुलाया और कहा:
“तू कुछ भी मांग, मैं वचन देता हूँ, पूरा करूंगा।”

चोर ने कहा: “तो वचन दीजिए कि आप अपनी पत्नी को फिर से राजमहल में सम्मान देंगे। वो आज भी आपकी रानी हैं, और माँ का सम्मान मिलना चाहिए।”

राजा ने चौंक कर पूछा:
“तू कौन है जो मुझे मेरे रिश्तों का ज्ञान दे रहा है?”

चोर ने उत्तर दिया:
“मैं वही हूँ, जो एक दिन आपकी सुरक्षा में सेंध लगाने आया था, लेकिन एक वचन ने मेरे हाथ रोक दिए।”

राजा की आंखों में पानी आ गया। उसने रानी को पुनः अपने पास बुला लिया और दरबार में चोर को आदर सहित प्रस्तुत किया।

राजा से उत्तराधिकारी की याचना

राजा ने कहा:
“अब तू मांग, मैं तुझे कुछ भी दूँगा।”

चोर बोला:
“राजन! आप संतानहीन हैं। मैं जानता हूँ कि मैं योग्य नहीं, पर मेरी नीयत अब शुद्ध है। यदि आपकी अनुमति हो, तो मुझे अपना पुत्र घोषित कर दीजिए।”

राजा ने सभा के समक्ष उसे गोद लेने का ऐलान किया। नामकरण हुआ, वैदिक विधि से उसका तिलक किया गया और वह चोर अब राजकुमार धर्मपाल कहलाया।

चोर से धर्मपाल तक की मानसिक यात्रा

अब वह चोर हर दिन आत्ममंथन करता, राजकाज सीखता और सतगुरु की बातों को जनता में प्रचारित करता। वह कहता:
“एक गुरु का एक वचन, यदि मन में बैठ जाए — तो जीवन ही नहीं, कुल की तकदीर बदल देता है।”

वह राजा बनने से पहले ही जननायक बन गया। उसकी नीतियाँ न्यायप्रिय थीं। जब वह स्वयं राजा बना, तो कोई भूखा नहीं सोता था, किसी स्त्री का अपमान नहीं होता था, और गुरुओं का मान सर्वोपरि होता।

सतगुरु की पुनः भेंट

एक दिन, सतगुरु स्वयं नगर आए। धर्मपाल (पूर्व चोर) उनके चरणों में गिर पड़ा और बोला:
“गुरुदेव, मैंने केवल एक वचन माना था, आपने मुझे धरती का स्वामी बना दिया।”

सतगुरु बोले:
“राज्य मैंने नहीं दिया पुत्र, तेरे मन का अनुशासन, श्रद्धा और एक बात को जीवन में उतारने की शक्ति ने तुझे यह सब दिया। मैं तो केवल दीपक हूँ, रौशनी तेरे संकल्प ने की है।”

यह कथा केवल एक चोर की राजा बनने की कहानी नहीं है — यह एक आत्मा की यात्रा है, जो अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ी। सतगुरु का वचन केवल शब्द नहीं होता — वह मंत्र होता है, जो यदि ठीक से ग्रहण कर लिया जाए, तो पत्थर को भी पारस बना देता है।

जीवन में यदि एक गुरु हो, और एक बात को दिल से माना जाए — तो स्वयं परमात्मा भी आपकी सहायता के लिए सृष्टि को झुका सकता है।

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