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🔶 चतुर्थ दिन – माँ कूष्मांडा की पूजा
🌼 देवी का नाम: माँ कूष्मांडा
- यह देवी दुर्गा का चौथा स्वरूप हैं।
- “कूष्मांडा” शब्द बना है –
- “कू” = थोड़ा,
- “उष्मा” = ऊर्जा या ताप,
- “अंड” = ब्रह्मांड।
- अर्थात, यह वही शक्ति हैं जिन्होंने थोड़ी सी मुस्कान से सृष्टि की रचना की – इसलिए इन्हें सृष्टि की आदिशक्ति भी कहा जाता है।
🌸 स्वरूप और प्रतीक:
- माँ कूष्मांडा का शरीर कांतिमय और उज्ज्वल है।
- इनके पास आठ भुजाएं होती हैं, इसलिए इन्हें अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है।
- इनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, अमृतकलश, चक्र, गदा और जपमाला होती है।
- इनका वाहन सिंह है।
🛕 पूजा विधि (Puja Vidhi):
- स्नान व शुद्धता:
- प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थान की सफाई करें।
- माँ कूष्मांडा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
- पूजन सामग्री:
- लाल या नारंगी फूल, धूप, दीप, चंदन, अक्षत, मिश्री, फल इत्यादि।
- विशेष रूप से कुम्हड़ा (कद्दू) का भोग शुभ माना जाता है।
- मंत्र जाप करें: “ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः” या “सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥”
- आरती करें और माँ से आयु, आरोग्य और यश की प्राप्ति हेतु प्रार्थना करें।
🌺 व्रत और साधना का महत्व:
- माँ कूष्मांडा की उपासना से आयु, स्वास्थ्य और तेज की प्राप्ति होती है।
- यह देवी सूर्यलोक में निवास करती हैं, और सूर्य की ऊर्जा को नियंत्रित करती हैं।
- साधकों को यह देवी भीतर की नकारात्मकता से मुक्त करती हैं और प्राणशक्ति प्रदान करती हैं।
🟡 चतुर्थ दिन का रंग और भोग:
- रंग: नारंगी (Orange) – ऊर्जा, उमंग और भक्ति का प्रतीक।
- भोग: माँ को कद्दू (कुम्हड़ा) या मालपुआ का भोग लगाना शुभ माना जाता है।