मैं मिट्टी से बात करता हूँ

Story King

एक किसान की अनोखी कहानी – “मैं मिट्टी से बात करता हूँ”

लोग कहते हैं मैं पागल हूँ… क्योंकि मैं मिट्टी से बात करता हूँ।
मेरा नाम भोलाराम है, और मैं खेतों में सिर्फ हल नहीं चलाता, सपने भी बोता हूँ।

सुबह जब गाँव अभी सो रहा होता है, मैं अपने खेत में पहुँच जाता हूँ। ओस की बूंदें पत्तों पर मोतियों की तरह चमकती हैं। मैं झुककर मिट्टी को हाथ में लेता हूँ और कहता हूँ —
“आज कैसा लग रहा है तुम्हें?”

तुम हँसोगे… पर सच कहूँ, मिट्टी जवाब देती है।
अगर वह नरम हो, तो समझ जाता हूँ कि बीज खुश रहेंगे। अगर सूखी हो, तो जान जाता हूँ कि उसे पानी की प्यास है।

एक दिन मेरे बेटे ने पूछा, “बाबा, आप शहर क्यों नहीं चले जाते? वहाँ पैसे ज्यादा मिलेंगे।”
मैं मुस्कुराया।
“बेटा, शहर में इमारतें उगती हैं, यहाँ जिंदगी उगती है।”

उस साल मैंने कुछ अलग किया। सबने धान बोया, मैंने फूल बो दिए। पूरे गाँव ने मज़ाक उड़ाया — “अरे, फूल खाकर पेट भरेगा क्या?”
पर जब बसंत आया, मेरा खेत रंगों से भर गया। लोग दूर-दूर से तस्वीरें लेने आए। उन फूलों ने मुझे इतना दिया कि धान भी शायद न देता।

तब समझ आया — किसान सिर्फ परंपरा नहीं, प्रयोग भी कर सकता है।
हम सिर्फ मौसम के भरोसे नहीं, अपने हौसले के भरोसे भी जीते हैं।

मैं किसान हूँ।
मेरे हाथ खुरदरे हैं, पर सपने मुलायम।
मेरी जेब हल्की है, पर दिल भारी — उम्मीदों से।

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