रक्षाबंधन एक पवित्र त्योहार है जो भाई-बहन के प्रेम और रक्षा के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इस पर्व से कई पौराणिक कथाएं जुड़ी हैं, जिनमें से एक बहुत प्रसिद्ध कथा द्रौपदी और श्रीकृष्ण से जुड़ी है। यह कथा रक्षाबंधन के महत्व को और गहराई से समझाने में मदद करती है।
द्रौपदी और श्रीकृष्ण की रक्षाबंधन कथा:
एक बार की बात है, जब श्रीकृष्ण ने शिशुपाल का वध किया था। शिशुपाल ने बार-बार श्रीकृष्ण का अपमान किया था और श्रीकृष्ण ने अंततः अपने सुदर्शन चक्र से उसका वध कर दिया। लेकिन जब श्रीकृष्ण ने चक्र चलाया, तो उनके हाथ में चोट लग गई और थोड़ा खून निकल आया।
यह देखकर द्रौपदी बहुत व्यथित हो गईं। उन्होंने तुरंत अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़ा और श्रीकृष्ण के हाथ पर बांध दिया ताकि खून बहना बंद हो जाए।
🌺 इस छोटी सी क्रिया ने एक बड़ा बंधन बना दिया।
श्रीकृष्ण ने इस स्नेह और भावनात्मक कृत्य को बहुत गहराई से महसूस किया और वचन दिया:
“जब भी तुम संकट में होगी, मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा।”
इसलिए, इसे रक्षा-सूत्र का एक प्रारंभिक रूप माना जाता है, और यहीं से रक्षाबंधन की भावना की एक गहरी नींव पड़ती है – जहाँ रक्षा का संबंध केवल भाई-बहन तक सीमित नहीं है, बल्कि स्नेह, सम्मान और कर्तव्य का भी प्रतीक है।
🪔 इस कथा का महत्व:
- यह दिखाता है कि रक्षा का वचन भावनाओं से जुड़ा होता है, न कि केवल खून के रिश्ते से।
- यह हमें यह भी सिखाता है कि एक छोटे से कार्य से एक बड़ा बंधन बन सकता है।
- श्रीकृष्ण ने अपने वचन को निभाया भी – जैसे कि वस्त्राहरण के समय द्रौपदी की लाज बचाई।
अगर आप चाहें, तो मैं रक्षाबंधन की अन्य पौराणिक कथाएं भी साझा कर सकता हूँ, जैसे:
- यम और यमुनाजी की कथा
- राजा बलि और लक्ष्मी जी की कथा
बताएं कौन-सी सुननी है?



