नीचे मैं “सुरीली कहानी” का नाट्य रूप अध्यायों की बजाय दृश्यों (Scenes/Acts) में प्रस्तुत कर रहा हूँ — पूरी तरह से एक रंगमंचीय नाटक की तरह।
🎭 सुरीली कहानी — एक नाट्य प्रस्तुति
विधा: सामाजिक-प्रेरणात्मक नाटक
दृश्य संरचना: तीन अंक (Acts)
🪷 मुख्य पात्र:
- मीरा – एक किशोरी लड़की, संगीत की दीवानी
- बाबूजी – मीरा के पिता, व्यावहारिक लेकिन कठोर
- अम्मा – मीरा की मां, स्नेही और ममतामयी
- पंडित जी – गांव के मंदिर के पुजारी
- संगीत गुरु – देहरादून के एक संगीत विद्यालय से
- संचालक – संगीत प्रतियोगिता का आयोजक
- दर्शक, गांव वाले, विद्यार्थी – सहायक पात्र
🎬 अंक 1: गांव के सुर
दृश्य 1: सुरगांव का घर, सुबह का समय
(मंच पर एक साधारण पहाड़ी घर, पृष्ठभूमि में पक्षियों की चहचहाहट और हल्की बांसुरी की धुन। मीरा खिड़की के पास बैठी है, आंखें बंद कर के गुनगुना रही है।)
अम्मा (रसोई से):
मीरा! अब बस भी कर, स्कूल नहीं जाना क्या?
मीरा (स्वर में):
अम्मा… ये धुन ना जाने कहां से आई है… रुक नहीं रही।
बाबूजी (अखबार पढ़ते हुए):
गाने-बजाने से पेट नहीं भरता, मीरा। पढ़ाई कर, तभी कुछ बनेगी।
मीरा (धीरे से):
मैं बनूंगी, बाबूजी। पर सुरों से।
दृश्य 2: गांव का मंदिर
(मीरा मंदिर में गा रही है, कुछ गांव वाले सुन रहे हैं, पंडित जी सिर हिला रहे हैं।)
पंडित जी (प्रभावित हो कर):
बेटी, तेरी आवाज़ में रब बसता है। तू ज़रूर एक दिन नाम करेगी।
🎬 अंक 2: संघर्ष और मंच
दृश्य 1: मीरा का अपने पिता से टकराव
मीरा:
मैं देहरादून जाना चाहती हूं, एक संगीत प्रतियोगिता में हिस्सा लेने।
बाबूजी (गुस्से में):
शहर जा कर क्या करेगी? लौट आ, जब दुनिया ताली नहीं ताने बजाएगी।
मीरा (आंखों में आंसू):
अगर लौटूं तो हार कर नहीं, जीत कर।
दृश्य 2: देहरादून की प्रतियोगिता
(बड़ा मंच, रोशनी, दर्शकों की भीड़। संचालक माइक पर है। मीरा मंच पर आती है।)
संचालक:
अब पेश है सुरगांव की मीरा… पहली बार किसी प्रतियोगिता में।
(मीरा गाना गाती है — “पल भर ठहर जा ज़िंदगी…”)
(तालियों की गड़गड़ाहट, मंच पर संगीत गुरु आते हैं।)
संगीत गुरु:
तुम्हारी आवाज़ में कुछ है। क्या तुम संगीत विद्यालय में आना चाहोगी?
(मीरा चौंकती है।)
🎬 अंक 3: घर वापसी और स्वीकृति
दृश्य 1: सालों बाद गांव का वही मंदिर
(अब मीरा प्रसिद्ध गायिका है, गांव में संगीत कार्यक्रम हो रहा है। मंच पर मीरा बैठी है, सामने बाबूजी, अम्मा, पंडित जी।)
मीरा:
आज जो कुछ भी हूं, वो उन्हीं सुरों की वजह से हूं जिन्हें बचपन में यहां सुना था।
बाबूजी (नेत्रों में जल):
बेटी, तू जीत गई… और हमें भी जीत लिया।
(तालियां, पृष्ठभूमि में वही गीत धीरे-धीरे बजता है।)
🌟 अंतिम संवाद (मीरा):
“हर इंसान के भीतर एक सुर छिपा होता है। अगर उसे पहचान लो… तो ज़िंदगी एक गीत बन जाती है।”
(मंच पर रोशनी धीरे-धीरे मंद पड़ती है… पर्दा गिरता है।)
📝 नाट्य तकनीकी निर्देश:
- पृष्ठभूमि संगीत: हल्का वाद्य संगीत, बांसुरी और तानपुरा का मिश्रण
- प्रकाश व्यवस्था: भावनात्मक दृश्यों में नीली-पीली लाइट, प्रतियोगिता में तेज़ स्पॉटलाइट
- वेशभूषा: ग्रामीण परिधान, मंच के अनुसार परिवर्तनीय
- गाने: मूल गीत या भजन जिनमें भावनात्मक गहराई हो



