एक कहानी – किसान की जुबानी
मेरा नाम रोशन लाल है। मैं उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव में रहता हूँ। मेरे लिए मेरी ज़मीन ही मेरी असली दौलत है। सुबह सूरज उगने से पहले ही मैं उठ जाता हूँ। जब पहली किरण खेतों पर पड़ती है, तो ऐसा लगता है जैसे भगवान खुद आशीर्वाद दे रहे हों।
मेरे दिन की शुरुआत बैलों और ट्रैक्टर के साथ होती है। कभी गेहूँ बोता हूँ, कभी धान। बरसात अच्छी हो जाए तो फसल लहलहा उठती है, लेकिन अगर बादल रूठ जाएँ तो दिल भी सूख जाता है। मैंने कई बार सूखा भी देखा है और कई बार बाढ़ भी। पर किसान का दिल बड़ा होता है — हर हाल में उम्मीद बोता है।
एक साल ऐसा भी आया जब लगातार बारिश से सारी फसल खराब हो गई। कर्ज़ बढ़ गया, घर की हालत कमजोर हो गई। उस समय मुझे लगा जैसे सब खत्म हो गया। लेकिन मेरी पत्नी ने हिम्मत दी — “धरती माँ कभी अपने बेटे को भूखा नहीं सुलाएगी।”
अगले साल मैंने फिर से मेहनत की। इस बार मौसम ने साथ दिया। खेतों में हरी-हरी बालियाँ झूम उठीं। जब मंडी में अनाज बेचा और घर लौटा, तो बच्चों की मुस्कान देखकर सारी थकान मिट गई।
मैंने सीखा है कि किसान सिर्फ अनाज नहीं उगाता, वह उम्मीद उगाता है, मेहनत बोता है और विश्वास काटता है। हमारी ज़िंदगी आसान नहीं, पर सच्ची है।
जब भी आप थाली में रोटी देखें, तो एक पल उस किसान को याद जरूर करें, जिसकी मेहनत से वह रोटी आपकी थाली तक पहुँची है।

