काली हवेली का रहस्य
— एक डरावनी कहानी
भारत के हर कोने में कोई न कोई भूतिया कहानी सुनी या सुनाई जाती है। लेकिन कुछ कहानियाँ इतनी सच्ची लगती हैं कि वह डरावनी कल्पना से कहीं ज़्यादा असली प्रतीत होती हैं। ऐसी ही एक कहानी है “काली हवेली” की — एक ऐसी हवेली, जो दशकों से वीरान पड़ी है, जहाँ न कोई आता है, न कोई जाता है। गांव वाले तो उसका नाम सुनते ही घर के दरवाज़े बंद कर लेते हैं। क्यों? आइए जानते हैं…
यह बात उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव “भवानीपुर” की है। गांव में न तो ज़्यादा लोग रहते थे और न ही वहाँ कोई विशेष चहल-पहल थी। खेत, कुएं और मिट्टी के घर — यही भवानीपुर की पहचान थी। लेकिन इस गांव के बीचोंबीच एक पुरानी हवेली खंडहर बनकर खड़ी थी, जिसे लोग काली हवेली कहते थे।
कहते हैं, उस हवेली में रात के समय अजीब-अजीब आवाजें आती थीं — कभी रोने की, कभी किसी औरत की चीख, तो कभी ज़ोर से दरवाज़ा पीटने की। लेकिन सबसे अजीब बात ये थी कि जो भी व्यक्ति उस हवेली में गया, वो कभी वापस नहीं आया।
गांव के बुज़ुर्गों के अनुसार, यह हवेली कभी एक रईस ज़मींदार “राजनाथ सिंह” की थी। राजनाथ सिंह बेहद क्रूर, घमंडी और तांत्रिक प्रवृत्ति का आदमी था। उसे तंत्र-मंत्र का इतना शौक था कि वह रात के समय काली पूजा करता और जानवरों की बलि देता था।
लोगों का कहना था कि उसने अमरता पाने के लिए एक काले तांत्रिक से मिलकर नरबलि (मानव बलि) देने का अनुबंध किया था। और एक रात, उसने अपनी ही जवान बेटी “रूपा” को बलि देने की कोशिश की। लेकिन रूपा ने इससे पहले खुद को हवेली की सबसे ऊँची छत से फेंक दिया।
उस रात से हवेली में अजीब घटनाएँ शुरू हो गईं — ज़मींदार पागल हो गया, नौकर गायब होने लगे, और अंततः पूरी हवेली बंद कर दी गई। तब से लेकर अब तक, हवेली ऐसे ही खड़ी है — बिना जीवन के, लेकिन मौत से भरी हुई।
राहुल और दोस्तों की जिज्ञासा
अब कहानी आती है 2020 की, जब शहर से चार दोस्त — राहुल, समीर, नेहा और राहुल की बहन पायल — गर्मी की छुट्टियों में गांव आए। राहुल का ननिहाल भवानीपुर में था, और वे सब कुछ नया अनुभव करने गांव आए थे।
एक दिन गांव के बाहर टहलते हुए उनकी नजर उस काली हवेली पर पड़ी।
“ये क्या है?” — नेहा ने पूछा।
“काली हवेली,” गांव के एक बुज़ुर्ग ने धीरे से कहा, “उसके बारे में मत पूछो बेटा, बहुत बुरा इतिहास है उसका।”
लेकिन जितना उन्हें मना किया गया, उतना ही उन चारों की जिज्ञासा बढ़ती गई। आखिरकार, एक दिन उन्होंने तय किया कि वे रात को हवेली के अंदर जाकर पता लगाएंगे कि सच में क्या होता है।
रात के 12 बजे। चारों ने टॉर्च और मोबाइल कैमरे साथ लिए और हवेली की ओर चल पड़े। हवेली के गेट पर जंग लगे लोहे की चेन लटकी हुई थी। दरवाज़ा ज़ोर लगाने पर खुद-ब-खुद खुल गया — जैसे किसी ने उनके आने की प्रतीक्षा की हो।
अंदर घुसते ही उन्हें धूल, मकड़ी के जाले और टूटी हुई खिड़कियों से भरा हुआ एक भयानक दृश्य मिला। सब तरफ अजीब सी ठंडक थी, जैसे वहाँ हवा नहीं, कोई अदृश्य ताक़त हो।
“शायद कुछ नहीं है,” समीर ने हँसते हुए कहा।
लेकिन तभी उन्होंने सीढ़ियों की तरफ से किसी के चलने की आवाज़ सुनी — टप… टप… टप…
चारों चौंक गए।
“कोई है?” राहुल ने ज़ोर से पूछा।
कोई जवाब नहीं आया। लेकिन आवाज़ें और तेज़ होती गईं।
वे धीरे-धीरे ऊपर जाने लगे। एक-एक कदम उन्हें गहराई में ले जा रहा था।
ऊपर का कमरा अब भी वैसा ही था जैसे किसी ने हाल ही में वहाँ पूजा की हो — बीच में एक काले रंग का सिंदूर से बना चक्र, चारों ओर दीये और एक बड़ा शीशा।
नेहा ने जैसे ही शीशे में देखा, वह ज़ोर से चीख उठी।
“क्या हुआ?” — सबने पूछा।
“उसमें… उसमें कोई और था… एक लड़की… सफेद साड़ी में… और उसकी आँखें खून जैसी लाल थीं!”
अब सब डर गए। अचानक हवा का तेज़ झोंका आया और दरवाज़ा अपने-आप बंद हो गया। कमरे में अंधेरा हो गया।
चारों घबरा गए और बाहर भागने की कोशिश करने लगे, लेकिन दरवाज़ा अंदर से बंद हो चुका था।
और तभी, कमरे के बीचोंबीच धुंआ इकट्ठा होने लगा। उस धुंए से एक आकृति उभरी — एक औरत… लंबे बाल, सफेद साड़ी, और आंखों से टपकता खून।
“तुम यहाँ क्यों आए हो?” वह आवाज़ गूंजी — धीमी, लेकिन गूंजती हुई।
राहुल कांपते हुए बोला, “हम सिर्फ जानना चाहते थे कि इस हवेली में क्या है… हम चले जाएंगे… प्लीज़ छोड़ दो।”
लेकिन आत्मा ने कहा, “अब जब देख ही लिया है… तो छोड़ूँगी नहीं…”
अचानक कमरे की सारी दीवारें हिलने लगीं। किताबें उड़ने लगीं। और रूपा की आत्मा ज़ोर से चीखने लगी। चारों इधर-उधर भागने लगे, लेकिन एक अदृश्य शक्ति ने नेहा को हवा में उठा लिया।
“नहीं… छोड़ दो उसे!” समीर चिल्लाया।
लेकिन देर हो चुकी थी। नेहा की आंखें पलट गईं और उसका शरीर ज़मीन पर गिर पड़ा — निर्जीव।
रूपा की आत्मा गायब हो गई, और कमरा फिर से शांत हो गया।
अब राहुल, समीर और पायल बुरी तरह डर चुके थे। वे किसी तरह नीचे भागे और दरवाज़ा खोलने की कोशिश करने लगे, लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला। तभी राहुल को अपने दादा की कही एक बात याद आई — “उस हवेली में एक गुप्त द्वार है, जो तहखाने से होकर खेतों तक जाता है।”
वे तीनों हवेली के तहखाने में पहुंचे। नीचे घना अंधेरा था, लेकिन उन्होंने मोबाइल की टॉर्च से रास्ता खोजा। अचानक पायल फिसल गई और उसे खरोंच आ गई। जैसे ही उसका खून ज़मीन पर गिरा, वहां एक औरत की हँसी गूंजी।
रूपा की आत्मा फिर से सामने आई।
“एक और बलि…” उसने कहा।
लेकिन इस बार राहुल ने अपने पास रखा सिंदूर का डिब्बा उसकी तरफ फेंक दिया।
रूपा ज़ोर से चीखी और धुएं में बदलकर गायब हो गई।
तीनों भागते हुए उस गुप्त रास्ते से बाहर निकलने लगे।
भवानीपुर का बदलाव
अगली सुबह, गांव वालों को हवेली से तीनों के चीखने की आवाज़ें सुनाई दीं। जब वे पहुंचे, तब तक तीनों किसी तरह भागकर बाहर आ चुके थे। नेहा की मौत की खबर से पूरा गांव शोक में डूब गया।
इसके बाद, गांव के पंडितों और साधुओं को बुलाकर हवेली में हवन करवाया गया। पंडितों ने कहा कि रूपा की आत्मा आज भी भटकी हुई है, क्योंकि उसका बलिदान अधूरा था। जब तक कोई उसकी आत्मा को शांति नहीं देगा, तब तक वह हर पूर्णिमा की रात किसी न किसी को बुलाती रहेगी।
रूपा को मुक्ति
राहुल और पायल ने रूपा की कहानी पर शोध करना शुरू किया। उन्होंने पुराने दस्तावेज़ और हवेली के रजिस्टर खंगाले और पाया कि रूपा बचपन में मंदिर में भजन गाती थी।
उन्होंने गांव के पंडित के साथ मिलकर एक संगीतमय प्रार्थना और यज्ञ करवाया — रूपा की पसंदीदा भजन के साथ।



